Simran Mallick / Mon, Sep 28, 2026 / Post views : 7
Pitru Stotra: पितृ पक्ष के दौरान पूर्वजों की शांति और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए कई धार्मिक परंपराओं में पूजा-पाठ, तर्पण और स्तोत्र पाठ किया जाता है। इन्हीं में पितृ स्तोत्र का भी विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है। मान्यता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक पितृ स्तोत्र का पाठ करने से पितरों का स्मरण और उनकी आराधना की जाती है।
पितृ स्तोत्र का क्या है धार्मिक महत्व?
हिंदू धार्मिक परंपरा में मनुष्य पर देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण का उल्लेख मिलता है। पितृ स्तोत्र को पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने वाले पाठ के रूप में देखा जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृ पक्ष में पितरों का स्मरण करने और श्रद्धापूर्वक स्तोत्र का पाठ करने से उनकी शांति के लिए प्रार्थना की जाती है। कुछ परंपराओं में इसे पितृ दोष से जुड़ी परेशानियों के निवारण के लिए भी किया जाता है।
पितृ पक्ष में कब करें पाठ?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष के दौरान पितरों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध और पूजा का विशेष महत्व होता है। यदि प्रतिदिन पितृ स्तोत्र का पाठ करना संभव न हो, तो कई लोग विशेष तिथियों पर इसका पाठ करते हैं।
हालांकि, पितृ दोष या किसी अन्य ज्योतिषीय समस्या के प्रभाव और उसके निवारण को लेकर अलग-अलग धार्मिक एवं ज्योतिषीय मत पाए जाते हैं। इसलिए इसे निश्चित परिणाम की गारंटी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
श्री पितृ स्तोत्र
पितृ स्तोत्र का पाठ श्रद्धापूर्वक किया जाता है। इसका उल्लेख गरुड़ पुराण के पूर्वखंड में रुचिकृत पितृ स्तोत्र के रूप में मिलता है।
॥ अथ श्री पितृ स्तोत्रम् ॥
अर्चितानाममूर्तानां पितॄणां दीप्ततेजसाम्।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्॥1॥
इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा।
सप्तर्षोणां तथान्येषां तान्नमस्यामि कामदान्॥2॥
मन्वादीनां च नेतारः सूर्याचन्द्रमसोस्तथा।
तान्नमस्याम्यहं सर्वान्पितॄनप्युदधावपि॥3॥
नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।
द्यावापृथिव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलिः॥4॥
प्रजापतेः कश्यपाय सोमाय वरुणाय च।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलिः॥5॥
नमो गणेभ्यः सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु।
स्वायम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे॥6॥
सोमाधारान्पितृगणान्योगमूर्तिधरांस्तथा।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम्॥7॥
अग्निरूपांस्तथैवान्यान्नमस्यामि पितॄनहम्।
अग्निसोममयं विश्वं यत एतदशेषतः॥8॥
ये च तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तयः।
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिणः॥9॥
तेभ्योऽखिलेभ्यो योगिभ्यः पितृभ्यो यतमानसः।
नमोनमो नमस्तेऽस्तु प्रसीदन्तु स्वधाभुजः॥10॥
॥ इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे रुचिकृतपितृस्तोत्रं नामैकोननवतितमोऽध्यायान्तर्गतम् ॥
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