नई दिल्ली: यूपीआई से पेमेंट करने वाले करोड़ों यूजर्स और कारोबारियों के लिए अगले कुछ दिन अहम रहने वाले हैं। 15 अक्टूबर 2026 से ₹2,000 से ज्यादा के कुछ यूपीआई मर्चेंट लेनदेन पर 0.4 फीसदी MDR लागू होने की तय तारीख है। हालांकि, डेडलाइन नजदीक आते ही मर्चेंट संगठनों, फिनटेक और पेमेंट कंपनियों ने इसे जनवरी 2027 तक टालने की मांग की है।
सूत्रों के मुताबिक, इंडस्ट्री की यह मांग नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) तक पहुंच चुकी है। इस मुद्दे पर वित्त मंत्रालय के साथ भी चर्चा चल रही है और NPCI जल्द ही इस पर फैसला ले सकता है।
MDR यानी Merchant Discount Rate वह शुल्क है, जो डिजिटल पेमेंट को प्रोसेस करने के लिए मर्चेंट की तरफ से पेमेंट सिस्टम से जुड़े पक्षों को दिया जाता है।
प्रस्तावित 0.4 फीसदी MDR के हिसाब से ₹2,000 के लेनदेन पर ₹8 और ₹10,000 के लेनदेन पर ₹40 का शुल्क बनता है। हालांकि, सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह दर किन-किन यूपीआई लेनदेन पर लागू होगी और अलग-अलग कैटेगरी के लिए शुल्क की व्यवस्था क्या होगी।
पेमेंट इंडस्ट्री का कहना है कि यूपीआई में अलग-अलग प्रकार के भुगतान के लिए अलग नियम और शुल्क व्यवस्था होने के कारण अभी कई चीजें पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। यूटिलिटी बिल, लोन की किस्त और कैपिटल मार्केट से जुड़े लेनदेन के लिए अलग-अलग दरों और नियमों को लेकर मर्चेंट्स और कंपनियों के बीच भ्रम की स्थिति है।
इसी वजह से इंडस्ट्री संगठनों का कहना है कि नई व्यवस्था लागू करने से पहले कंपनियों और कारोबारियों को तैयारी के लिए अतिरिक्त समय मिलना चाहिए।
15 अक्टूबर की तारीख ऐसे समय पड़ रही है जब देश में त्योहारी खरीदारी तेज होगी। पेमेंट इंडस्ट्री और कुछ मर्चेंट संगठनों को चिंता है कि त्योहारी सीजन के दौरान MDR लागू होने से कारोबारियों की लागत बढ़ सकती है।
इंडस्ट्री की मांग है कि कम से कम फेस्टिव सीजन खत्म होने तक इसे टाल दिया जाए। आशंका यह भी है कि कुछ कारोबारी बढ़ी हुई लागत का बोझ अप्रत्यक्ष रूप से ग्राहकों पर डाल सकते हैं।
कार्ड पेमेंट में मर्चेंट की कैटेगरी के आधार पर शुल्क व्यवस्था अपेक्षाकृत स्पष्ट होती है। वहीं यूपीआई में अलग-अलग प्रकार के भुगतान के लिए अलग नियम बनाए गए हैं।
यूपीआई के जरिए ऐसे कई भुगतान भी किए जाते हैं जो पारंपरिक कार्ड पेमेंट व्यवस्था से अलग हैं। इनमें लोन रीपेमेंट और कैपिटल मार्केट से जुड़े कुछ भुगतान शामिल हैं। यही वजह है कि यूपीआई MDR की नई व्यवस्था को लेकर पेमेंट कंपनियां और मर्चेंट संगठन अतिरिक्त स्पष्टता की मांग कर रहे हैं।
लोन की किस्त के भुगतान को लेकर भी पेमेंट इंडस्ट्री में सवाल हैं। कई बार ऑटो-डेबिट फेल होने के बाद ग्राहक खुद यूपीआई के जरिए किस्त जमा करते हैं। ऐसे मैनुअल पेमेंट को किस श्रेणी में रखा जाएगा और उस पर कितना शुल्क लगेगा, इसे लेकर स्पष्टता की मांग की जा रही है।
पेमेंट कंपनियों के सामने यह भी सवाल है कि फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन पेमेंट और सामान्य यूपीआई ट्रांजैक्शन के बीच अंतर किस तरह किया जाएगा।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि 15 अक्टूबर 2026 से UPI MDR लागू होगा या इसे जनवरी 2027 तक टाल दिया जाएगा। इंडस्ट्री की मांग NPCI तक पहुंच चुकी है और वित्त मंत्रालय के साथ चर्चा जारी बताई जा रही है।
अगर NPCI तारीख में बदलाव नहीं करता है, तो तय नियमों के अनुसार 15 अक्टूबर से पात्र ₹2,000 से ज्यादा के यूपीआई मर्चेंट पेमेंट पर MDR लागू हो सकता है। वहीं, अगर इंडस्ट्री की मांग स्वीकार की जाती है तो कारोबारियों और पेमेंट कंपनियों को तैयारी के लिए अतिरिक्त समय मिल जाएगा।
अब सबकी नजर NPCI के अगले फैसले पर है, जिससे यह साफ होगा कि 15 अक्टूबर की डेडलाइन बरकरार रहती है या UPI MDR पर जनवरी 2027 तक राहत मिलती है।
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