Simran Mallick / Sat, Aug 8, 2026 / Post views : 92
रायपुर/नई दिल्ली: छत्तीसगढ़ के बस्तर की समृद्ध जनजातीय संस्कृति, लोककला और परंपराओं को राष्ट्रीय स्तर पर एक और बड़ी पहचान मिली है। 30 जुलाई 2026 को बस्तर का 209 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल राष्ट्रपति भवन पहुंचा, जहां राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों से मुलाकात की।
प्रतिनिधिमंडल में बस्तर पंडुम 2026 के विजेता, पारंपरिक जनजातीय नेतृत्व से जुड़े मांझी-चालकी, पद्मश्री सम्मानित व्यक्तित्व और जनप्रतिनिधि शामिल रहे। राष्ट्रपति ने बस्तर की लोककला, जनजातीय परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में योगदान दे रहे कलाकारों और प्रतिनिधियों की सराहना की।
इस मुलाकात के दौरान बस्तर की पारंपरिक कला और संस्कृति को देश के सर्वोच्च संवैधानिक संस्थान तक पहुंचने का अवसर मिला।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को बस्तर की करीब 300 वर्ष पुरानी ‘झिटकू-मिटकी’ लोकगाथा से जुड़ी जनजातीय कलाकृति भेंट की।
‘झिटकू-मिटकी’ को बस्तर की लोकपरंपरा में प्रेम, त्याग, आस्था और सामाजिक मूल्यों से जुड़ी महत्वपूर्ण लोकगाथा माना जाता है। इस कलाकृति के जरिए बस्तर की पारंपरिक कला और लोकविश्वास की झलक राष्ट्रपति भवन तक पहुंची।
राष्ट्रपति मुर्मु ने बस्तर पंडुम जैसे आयोजनों को जनजातीय परंपराओं और लोककला को व्यापक पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण बताया। ऐसे आयोजनों के माध्यम से बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामने लाने में मदद मिल सकती है।
राष्ट्रपति ने बस्तर दशहरा और बस्तर पंडुम में भविष्य में शामिल होने की इच्छा भी व्यक्त की।
बस्तर की कला, संस्कृति और पारंपरिक विरासत का राष्ट्रपति भवन तक पहुंचना छत्तीसगढ़ के लिए गौरव का विषय है। इससे बस्तर के स्थानीय कलाकारों, शिल्पकारों और पारंपरिक कला से जुड़े समुदायों को देशभर में नई पहचान मिलने की उम्मीद बढ़ी है।
बस्तर की धातु शिल्प, काष्ठ कला, लोकगाथाएं, पारंपरिक नृत्य और जनजातीय रीति-रिवाज लंबे समय से इसकी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा रहे हैं। ऐसे राष्ट्रीय मंचों पर इन्हें स्थान मिलने से आने वाली पीढ़ियों तक इस विरासत को संरक्षित और आगे बढ़ाने के प्रयासों को भी मजबूती मिल सकती है।
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